हजारों वर्षों पूर्व भारतवर्ष में ऋषि मुनियों ने आयुर्वेद के अनमोल ज्ञान को ग्रंथों में संग्रहित कर दिया था, जो चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, और दूसरे अन्य ग्रंथो के रूप में जन साधारण में उपलब्ध हैं, इन ग्रंथो में मूलतः प्रकृति में व्याप्त पांच मूल तत्वों के मनुष्य के शरीर पर प्रभाव और उनके संतुलन के बारे में वर्णन किया गया है ये पांच तत्व पृथ्वी अग्नि, जल, आकाश हैं, आयुर्वेद के अनुसार मानव शरीर में जितने भी तत्व सम्मिलित होते हैं उनमे इन तत्वों का प्रभाव प्रमुख रूप से देखा जाता है,जिन्ह आयुर्वेद में दोष के रूप में जाना जाता है, और इन्हे तीन भागों में वर्गीकृत किया गया है जो निम्न प्रकार से हैं
१. वात दोष (आकाश और वायु तत्त्वों से मिलकर बना है)
२. पित्त दोष (अग्नि और जल तत्वों के मिलने से बना है )
३. कफ दोष (पृथ्वी और जल तत्वों क मिलकर बना है )
आयुर्वेद इन सभी तत्वों और दोषों क सन्तुलन को बनाने रखने के कुछ सिद्धांतों पर कार्य करता है ताकि इन तत्वों कम या ज्यादा होने से होने वाले रोगों से मनुष्य शरीर को बचाया जा सके, इसलिए आयुर्वेद का मानना है की
१. मनुष्य को अपना जीवन जितना सम्भव हो सके प्राकृतिक पद्धति से जीना चाहिए।
२. अपनी भोजन शैली, अचार विचार, और अपनी दिनचर्या को संयमित तरीके से जीना चाहिए जिसके फलस्वरूप मनुष्य गंभीर रोगो से हमेशा बच सकता है।
३. मनुष्य के मन में विलासिता पूर्ण खानपान और ऐश्वर्य को लेकर जो इच्छाऐं जाग्रत होती हैं और उनकी पूर्ति के फलस्वरूप मनुष्य शरीर में विभिन्न गंभीर रोग उतपन्न हो जाते हैं अतः इनसे दुरी बनाए रखना ही मनुष्य के लिए श्रेयस्कर होता है।
४. मनुष्य की विभिन्न प्रकार की उचित अनुचित इच्छाएं ही उसकी जीवन शैली पर अच्छे और बुरे प्रभाव डालती हैं, मानव स्वभाव में क्रोध, काम, मोह, आलस्य और अन्य नकारात्मक प्रवत्तियाँ मानव शरीर में रोग का कारण बनती हैं।
५. आयुर्वेद सदैव इस बात का पक्षधर है की मनुष्य को यदि स्वस्थ जीवन जीना है तो अपने शरीर की प्रकति को समझना चाहिए और उसके अनुसार ही उचित भोजन पद्धति को अपनाना चाहिए ।
मेरे कई परिचित जनों ने जिन्हे मांसाहार और मद्यपान के कारण, लिवर किडनी, आंतो की गंभीर रोग लग चुके थे, और उनके जीवन में अलोपेथिक दवाइयों, महंगी अर्थहीन जांचों, बार बार डॉक्टर बदलने के बाद भी कोई खास सुधार नहीं दिखाई दिया, तब उन्होंने आयुर्वेदिक जीवन शैली को अपने जीवन में उतारना शुरू किया, कम मसाले के ताजे भोजन, शाकाहार, और उचित आयुर्वेदिक दवाओं के सेवन के फलस्वरूप अमाशय के सभी रोगों से मुक्ति पा ली और अपने शरीर के भार, बढ़े हुए पेट, शारीरिक शिथिलता और बढ़ती हुई आयु के असर को भी काफी हद तक कम कर लिया और अब रोगरहित सुखी ऊर्जावान जीवन का आनंद उठा रहे हैं और अपने संबंधियों में भी आयुर्वेद का प्रचार कर रहे हैं।

मैं अपना खुद का अनुभव यहां इस ब्लॉग पर शेयर कर रहा हु की , एक बार मुझे टाइफाइड बुखार हुआ था जिसमे मैं लगभग मरणासन्न स्थिति में पहुच गया था । किंतु ईश्वर की कृपा कहे या माता पिता का आशीर्वाद , मैं ठीक हो कर हस्पताल से वापिस आ गया किंतु कुछ ही दिनों बाद मेरे बाल झड़ने शुरू हो गए।। मतलब, भरी जवानी में गंजा । बहुत डॉक्टर्स को दिखाया किंतु कोई लाभ नही हुआ । समय बीतता गया और मैं गंजा । एक दिन एक व्यक्ति ने बताया कि आप किसी वैद को बताओ । फिर क्या था मैं पहुच गया मेरठ के मशहूर वैध , वैध देवेंद्र दत्त कौशिक के पास।। 15 दिन 30 पुड़िया, बस काम खत्म । बाल आज भी ऐसे जिनसे रेल गाड़ी खींच लो ।।
ReplyDeleteआयुर्वेद पर अटूट भरोसा है मुझे ।। एलोपैथिक दवा न लेता न सलाह देता ।।