आयुर्वेद के त्रिदोष
आयुर्वेद में रोग की चिकित्सा रोगी के शरीर की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए की जाती है जबकी एलोपेथी में डॉक्टर सभी रोगियों को को एक जैसी दवा लिख देता है, पर आयुर्वेद प्रथमतः रोगी के शरीर की प्रकृति की पड़ताल करने की सलाह देता है ताकि ये पता चल सके की रोगी के शरीर में वात, कफ, पित्त में किसकी अधिकता ज्यादा है, जिसके कारण रोगी को दी जाने वाली औषधि और उसकी मात्रा में भी अंतर् हो जाता है।
इसीलिए एक आयुर्वेद के चिकित्स्क के लिए इन तीन दोषो को भली प्रकार से जानना आवश्यक हो जाता है, जैसा की हम जानते हैं की मानव शरीर पंच तत्वों से बना है, जिन्हे हम पृथ्वी, अग्नि, जल, आकाश और वायु, और तीनों दोषों में से हर एक दोष में इन तत्वों में से २ तत्व मौजूद होते हैं, हर मनुष्य के शरीर में ये तीनो तत्व संतुलित मात्रा में होते हैं तो उसका स्वास्थ्य ठीक माना जाता है, और इन तीनो तत्वों में जब असंतुलन हो जाता है तो मनुष्य किसी रोग से ग्रस्त हो जाता है
दोषों में असंतुलन के कारण
मनुष्य के शरीर में इन तीनों दोषों की स्थिति निरंतर परिवर्तित होती रहती है और इसके लिए उस मनुष्य का भोजन शैली एवं जीवन चर्या ही जिम्मेदार होती है, विभिन्न प्रकार के भोजन अलग अलग दोष का प्रतिनिधित्व करते हैं, मतलब आपके द्वारा खाया जाने वाला हर पदार्थ तीनों दोषो में से किसी को प्रभावित करता है, जिसके कारण शरीर में दोषो की मात्रा निरंतर बदलती रहती है, और कभी ज्यादा असंतुलन हो जाने के कारण मनुष्य रोगी बन जाता है
Very helpful information!
ReplyDeleteThanks for sharing 🙏