Friday, July 23, 2021

वात कफ और पित्त - आयुर्वेद के दृष्टिकोण से


आयुर्वेद के त्रिदोष 

आयुर्वेद में रोग की चिकित्सा रोगी के शरीर की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए की जाती है जबकी एलोपेथी में डॉक्टर सभी रोगियों को को एक जैसी दवा लिख देता है, पर आयुर्वेद प्रथमतः रोगी के शरीर की प्रकृति की पड़ताल करने की सलाह देता है ताकि ये पता चल सके की रोगी के शरीर में वात, कफ, पित्त में किसकी अधिकता ज्यादा है, जिसके कारण रोगी को दी जाने वाली औषधि और उसकी मात्रा में भी अंतर् हो जाता है। 

इसीलिए एक आयुर्वेद के चिकित्स्क के लिए इन तीन दोषो को भली प्रकार से जानना आवश्यक हो जाता है, जैसा की हम जानते हैं की मानव शरीर पंच तत्वों से बना है, जिन्हे हम पृथ्वी, अग्नि, जल, आकाश और वायु, और तीनों दोषों में से हर एक दोष में इन तत्वों में से  २ तत्व मौजूद होते हैं,  हर मनुष्य के शरीर में ये तीनो तत्व संतुलित मात्रा में होते हैं तो उसका स्वास्थ्य ठीक माना जाता है, और इन तीनो तत्वों में जब असंतुलन हो जाता है तो मनुष्य किसी रोग से ग्रस्त हो जाता है 


दोषों में असंतुलन के कारण 

मनुष्य के शरीर में इन तीनों दोषों की स्थिति निरंतर परिवर्तित होती रहती है और इसके लिए उस मनुष्य का भोजन शैली एवं जीवन चर्या ही जिम्मेदार होती है, विभिन्न प्रकार के भोजन अलग अलग दोष का प्रतिनिधित्व करते हैं, मतलब आपके द्वारा खाया जाने वाला हर पदार्थ तीनों दोषो में से किसी को प्रभावित करता है, जिसके कारण शरीर में दोषो की मात्रा निरंतर  बदलती रहती है, और कभी ज्यादा असंतुलन हो जाने के कारण मनुष्य रोगी बन जाता है  




Sunday, July 18, 2021

आयुर्वेद के नियम

 

अनंत काल से आयुर्वेद मनुष्य के लिए प्रकृति का वरदान साबित होता रहा है, भारत के अनेकों ऋषि मुनियों ने अपने  ज्ञान और अनुभव के द्वारा आयुर्वेद की चिकित्सा के सिद्धांत प्रतिपादित किये, जो आज भी मनुष्य के लिए उतने ही प्रासंगिक हैं जितने पहले थे, मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए जो भी आवश्यक होता है वो किसी उचित जानकारी के आभाव में मनुष्य नहीं प्राप्त कर पाता है या कुछ गलत भोजन शैली और जीवन चर्या के कारण खुद को रोगो के संकट में डाल लेता है, 

मानव शरीर में  स्वास्थ्य के संतुलन को बनाये रखने के लिए जो तीन मुख्य तत्व जिम्मेदार होते हैं उन्हें आयुर्वेद में त्रिदोष कहा जाता है, और मनुष्य की निरंतर बदलती भोजन शैली, आचार विचार के कारण इन तीन दोषो के संतुलन में परिवर्तन आता रहता है, जिसके कारण ही शरीर में विभिन्न प्रकार के दोष और रोग उतपन्न होने लगते हैं इन इन  तीनों दोषो को वात, कफ, और पित्त कहा जाता है, 

आयुर्वेद शरीर को स्वस्थ रखने के लिए कुछ नियमों का पालन करना आवश्यक होता है , यही आयुर्वेद चिकित्सा पद्धिति का मूल है। 




१.  मनुष्य को हमेशा उचित नींद लेनी चाहिए, जरूरत से ज्यादा या कम सोना दोनों ही हानिकारक होते हैं, और जितना जल्दी हो सके रात को सही समय पर सो जाएँ और सुबह भोर काल में ही उठ जाएँ, भोर काल अर्थात सूरज निकलने से कुछ समय पहले, और सूर्य निकलने पर उषा पान करें 

२. उठने के बाद हल्का गर्म गुनगुना  एक लीटर पानी पीना चाहिए, उसे पीने से शरीर के अंदर की क्रियाएं धीरे धीरे शुरू होने लगती हैं. जिसके कारण मनुष्य को आसान नित्य कर्म में सहायता मिलती है, और पेट सही प्रकार से खाली हो पाता है फलस्वरूप सुबह सुबह ही मनुष्य कब्ज, रक्त चाप, अपच, वायु, और पेट के अन्य रोगों के चपेट में आने से बच जाता है ।

३. उसके उपरान्त  मनुस्य को खुले स्थान पर योग क्रियाएं करनी चाहिए, जिससे शरीर अन्य रोगों से हमेशा के लिए बच सकता है और पूरे दिन के लिए स्फूर्तिमान बन जाता है और दैनिक कार्यों में अत्यंत ऊर्जावान होकर कार्य करता है 

४.  उचित प्रकार के जल से सुबह ही स्नान कर लेना चाहिए, जिससे शरीर अनावश्यक थकान और आलस्य से बच जाता है।  

५. स्नान के बाद अपने पूजा घर में भगवान की पूजा उपासना जरूर करें , ध्यान लगाएं, मंत्र जाप करें. ध्यान लगाने से मन की एकाग्रता बढ़ती है, तनाव कम होता है,    

६. पूजा कार्य के बाद उचित प्रकार से बना हुआ सात्विक नाश्ता करें और भरपूर मात्रा में करें जिससे आपके शरीर को दिन भर ऊर्जा मिलती रहे और दोपहर को मध्यम भोजन की ही आवश्यकता पड़े, साथ इस बात का भी ध्यान रखें की पानी भोजन करने से आधा घंटा पहले और आधा घंटा बाद ही पियें ।

 

आयुर्वेद के अनुसार भोजन कैसे करें 

आम तौर पर हम लोग बिना जाने ही कुछ भी भोजन कर लेते हैं लेकिन आयुर्वेद में हर खाने योग्य पदार्थ के लिए मौसम और समय का निर्धारण किया गया है , साथ ही दिन भर में ३ लीटर सादा पानी पियें, 




आयुर्वेद के अनुसार उचित भोजन के अवयव 

आयुर्वेद मे भोजन मे रस का अत्यधिक महत्व बताय गया है,  हमारे शरीर मे त्रिदोषो के सन्तुलन के लिये विभिन्न रसों का होना अत्यंत आवश्यक होता है जिनके होने से खाये जाने वाले भोजन को पचाना पेट के लिए आसान हो जाता है,  ये रस ६ प्रकार के होते हैं १. मधुर (मिठास ), २. लवण (नमकीन), ३. तिक्त (तीखा) , ४. अम्ल (खट्टा),  ५. कटु (कड़वा)  ६. कषाय ( कसैला), ये ६ प्रकार के रस यदि हमारे भोजन में उचित अनुपात में होते हैं तो हमे भोजन के अत्यधिक लाभ मिलते हैं और भोजन भी रुचिकर लगता है, साथ ही इनकी कमी से होने वाले त्रिदोष में भी राहत मिलती है । 





 पानी पीने के नियम 

पानी को आयुर्वेद में अम्रत कहा गया है, तथा इसके पीने के भी नियम बताये गए हैं, पानी को खाने से आधा घंटा पहले पीना चाहिए, या खाने के आधा घंटा बाद और पानी को धीरे धीरे बैठ कर पीना चाहिए, जल्दी और एक साथ पानी पीना स्वास्थ्य के लिए नुक्सान दायक हो सकता है और कभी कभी साँस में भी रुकावट उत्पन्न कर सकता है ।


धूप का महत्व 

मनुष्य को सुबह की धुप लेनी चाहिए, यदि एकदम सुबह की धुप न ले पाएं तो भी दिन में कभी भी १० १५ मिनट के लिए खुली हवा के साथ धुप लेनी चाहिए, सर्दियों में ये समय आधा घंटा या उससे ज्यादा होना चाहिए, धूप लेने से शरीर में विटामिन डी की मात्रा कम नहीं होती और हमारी हड्डियां मजबूत रहती हैं और नेत्रों की ज्योति भी बढ़ती है



नींद का महत्व 

एक वयस्क मनुष्य को दिन भर में ८  से ९ घंटे की नींद लेनी चाहिए, जिससे शरीर की सारी थकान खत्म हो जाती है, और मनुष्य ऊर्जावान बना रहता है, साथ ही शरीर में नई कोशिकाओं का निर्माण होता है, और तनाव संबंधी रोगो से शरीर पूरी तरह मुक्त रहता है तथा शरीर पर बढ़ती आयु के लक्षण नहीं दिखाई देते, और शरीर युवा ही बना रहता है।  




आयुर्वेद के अनुसार परहेज 

आयुर्वेद में शरीर को बिमारियों से बचाने के लिए कुछ पदार्थों का त्याग भी उचित बताया गया है , जिससे हमारा स्वास्थ्य उत्तम बना रह सकता है, और रोगों  से बचाव रहता है,

१. तामसिक पदार्थों जैसे मांस मछली, मदिरा अन्य नशे के पदार्थों का सम्पूर्ण त्याग उत्तम स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक बताया गया है. 

२. किसी रोग के उपचार के समय  जो भी आयुर्वेदिक औषधियां दी जाती हैं उनके नियमित सेवन के समय अत्यधिक चटपटे , तैलीय भोजन को त्यज्य बताया गया है जिनके कारण से रोगो के उपचार में देरी हो सकती है।

३. कभी भी भोजन में गर्म और ठंडे पदार्थ एक साथ नहीं खाने चाहिए जिससे पाचन पर बहुत बुरा असर पड़  सकता है और पाचन धीमा हो सकता है,

४. चाय काफ़ी का प्रयोग नहीं करना चाहिए , करना भी पड़े तो बहुत कम मात्रा में चाय कॉफी ले सकते हैं।  

५. केले आम जैसे कुछ फलों को छोड़कर किसी रसीले फल के साथ दूध नहीं पीना चाहिए, संतरे प्रजाति के फलों के उपभोग के आस पास दूध पीना अत्यंत नुकसान दायक हो सकता है   



Wednesday, July 14, 2021

आयुर्वेद का महत्व !!

 



आयुर्वेद की आवश्यकता 

आज के भौतिक युग में मनुष्य के जीवन में व्यस्तता, भागदौड़ और प्रतियोगिता के कारण हर व्यक्ति के शारीरिक एवं मानसिक क्षेत्र में अत्यंत दबाव आने लगा है जिसके कारण मनुष्य विविध प्रकार के रोगों के संक्रमण में आ रहा है , अधिकतर लोग तो ऐसे भी देखने में आते हैं जिनके शरीर के हर अंग में कोई न कोई रोग जगह बना चुका है, हर रोग के अपने कारण हो सकते हैं लेकिन रोगों पर होने वाले हर शोध में हर रोग के मूल में लोगों की बिगड़ती भोजन शैली, रहन सहन, आचार विचार और बढ़ते तनाव ही पाया जाता है, और ऐसे में जब हर व्यक्ति एलोपेथिक डॉक्टरों के चक्कर काट काट कर महंगी दवाइयां और अनावश्यक टेस्ट, एलोपेथिक डाक्टर की महंगी फ़ीस , उसके बाद भी इलाज की कोई गारंटी नहीं होती तो एक आम आदमी गहरे तनाव में और ज्यादा गिरता चला जाता हैं

उस समय आयुर्वेद ही उसे नजर आता है जो उसे बेहद असरदार और सुरक्षित तरीके से रोगमुक्त कर देता हैऔर इसका इलाज भी एलोपेथी से कहीं ज्यादा सस्ता रहता है,

 आयुर्वेद के लाभ

१.  आयुर्वेदिक जीवन शैली से मनुष्य जटिल से जटिल रोग से मुक्त हो सकता है जिसका अभी तक एलोपेथी में इलाज भी नहीं है।

२. लोगो को आयुर्वेदिक दवाइयों का कोई हानिकारक प्रभाव नहीं होता ।

३. आयुर्वेद की ओषधियाँ रोग के मूल में जाकर रोग का निदान करती हैं।

४. आयुर्वेद अपनाने के बाद हमारे जीवन चर्या में संतुलन आ जाता है जिसके कारण आगे होने वाले रोगों से मनुष्य पहले ही बचना शरू कर देता है ।

५. आयुर्वेद में रोगी का इलाज कभी भी ज्यादा महंगा नहीं होता और बेहद कम खर्च में भी बड़े गंभीर रोगों का इलाज हो जाता है।

६. आयुर्वेद अपनाने से मनुष्य के शारीरिक और मानसिक स्थिति में बेहतर संतुलन आता है जिसके कारण उसका अपने दैनिक जीवन के कार्यों में एकाग्रता बढ़ जाती है   

 


 मेरा स्वयं का अनुभव

 कुछ वर्ष पूर्व  में खुद गंभीर ब्रोन्काइट्स से पीड़ित था और सारा दिन मुझे खांसीबलगम की समस्या रहती थी थोड़ी दूर चलते ही हांफने लगता था, गले में कफ के कारण साँस की नली चोक हो जाया करती थी, मेंने काफी अलोपेथिक डॉक्टरों को दिखाया जिन्होंने मेरे हाथ में इन्हेलर दे दिए और मुझे ये विश्वास दिलाया की मुझे अस्थमा शुरू हो चूका है और जो अब कभी ठीक नहीं हो सकेगा बस उसे थोड़ा बहुत कंट्रोल किया सकेगा, मुझे लगातार दवाइयां और इंहेलर पर रहना पड़ेगा, और जीवन में कोई भी भारी कार्य नहीं कर सकूंगा। 

लेकिन उन एलोपेथिक दवाइयों क कारण मुझे मात्र ३० वर्ष की आयु में ही लो बीपी रहने लगा था कफ की समस्या में भी कोई खास फायदा नहीं हुआ, और डाक्टर की महंगी फ़ीस दे देकर में अपनी सेलरी का बहुत बड़ा भाग इलाज में खर्च कर रहा था, फिर मैंने पतंजलि आयुर्वेदिक औषद्यालय में जाकर दिखाया जहा मेरा डॉक्टरी चेकअप एकदम फ्री हुआ सिर्फ दवाइयों के पैसे लिए गए।

 जो की १५ दिन के लिए दी गई थी और वही दवाइयां मेरे घर क नजदीक के ही पतंजलि आयुर्वेदिक दवाई केंद्र पर उपलब्ध थी, जिनके सेवन से पहले हफ्ते में ही अत्यधिक लाभ नजर आने लगा था, और कुछ योग क्रियाएं साथ में करने से ही एक ही महीने में ही मेरा ब्रोंकाइटिस लगभग खत्म हो गया था और दवाइयां भी बेहद सस्ती थीं। 

 उसके बाद मुझे ये अनुभव हुआ की यदि में अपने देश के ही आयुर्वेद के द्वारा इतनी जल्दी रोग मुक्त हो सकता हूँ तो फिर मुझे दूसरे रोगियों की भी सहयता करनी चाहिए जो अब तक एलोपेथिक इलाज करा क्र परेशान हो रहे हैं, इसीलिए में लोगों को आयुर्वेद के लाभ समझाने लगा और धीरे धीरे उन्हें अन्य रोगों के आयुर्वेदिक निदान भी बताने लगा जिससे लोगों ने अत्यधिक लाभ उठाया, और उसके बाद मुझे आयुर्वेद को और बड़े स्तर पर प्रसार करने की आवश्यकता अनुभव हुई।

इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए मैंने ये आयुर्वेदिक मित्र का ब्लॉग लिखना शुरू किया ताकि इसके माध्यम से में ज्यादा से ज्यादा लोगों को आयुर्वेद के लाभ पहुंचा सकूं।

Sunday, July 11, 2021

आयुर्वेद के मूल सिद्धांत क्या हैं ??


 हजारों वर्षों पूर्व भारतवर्ष में ऋषि मुनियों ने आयुर्वेद के अनमोल ज्ञान को ग्रंथों में संग्रहित कर दिया था, जो चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, और दूसरे अन्य ग्रंथो के रूप में जन साधारण में उपलब्ध हैं, इन ग्रंथो में मूलतः प्रकृति में व्याप्त पांच मूल तत्वों के मनुष्य के शरीर पर प्रभाव और उनके संतुलन के बारे में वर्णन किया गया है  ये पांच तत्व पृथ्वी अग्नि, जल, आकाश हैं, आयुर्वेद के अनुसार मानव शरीर में जितने भी तत्व सम्मिलित होते हैं उनमे इन तत्वों का प्रभाव प्रमुख रूप से देखा जाता है,जिन्ह आयुर्वेद में दोष के रूप में जाना जाता है,  और इन्हे तीन भागों में वर्गीकृत किया गया है जो निम्न प्रकार से हैं 


१. वात दोष (आकाश और वायु तत्त्वों से मिलकर बना है)

२. पित्त दोष (अग्नि और जल तत्वों के मिलने से बना है )

३. कफ दोष (पृथ्वी और जल तत्वों क मिलकर बना है )




आयुर्वेद इन सभी तत्वों और दोषों क सन्तुलन को बनाने रखने के कुछ सिद्धांतों पर कार्य करता है ताकि इन तत्वों कम या ज्यादा होने से होने वाले रोगों से मनुष्य शरीर को बचाया जा सके, इसलिए आयुर्वेद का मानना है की 


१. मनुष्य को अपना जीवन जितना सम्भव हो सके प्राकृतिक पद्धति से जीना चाहिए। 


२. अपनी भोजन शैली, अचार विचार, और अपनी दिनचर्या को संयमित तरीके से जीना चाहिए जिसके फलस्वरूप मनुष्य गंभीर रोगो से हमेशा बच सकता है। 


३. मनुष्य के मन में विलासिता पूर्ण खानपान और ऐश्वर्य को लेकर जो इच्छाऐं जाग्रत होती हैं और उनकी पूर्ति के फलस्वरूप मनुष्य शरीर में विभिन्न गंभीर रोग उतपन्न हो जाते हैं अतः इनसे दुरी बनाए रखना ही मनुष्य के लिए श्रेयस्कर होता है। 

 

४.  मनुष्य की विभिन्न प्रकार की उचित अनुचित इच्छाएं ही उसकी जीवन शैली पर अच्छे और बुरे प्रभाव डालती हैं, मानव स्वभाव में क्रोध, काम, मोह, आलस्य और अन्य नकारात्मक प्रवत्तियाँ मानव शरीर में रोग का कारण बनती हैं।


५. आयुर्वेद सदैव इस बात का पक्षधर है की मनुष्य को यदि स्वस्थ जीवन जीना है तो अपने शरीर की प्रकति को समझना चाहिए  और उसके अनुसार ही उचित भोजन पद्धति को अपनाना चाहिए ।


मेरे कई परिचित जनों ने जिन्हे मांसाहार और मद्यपान के कारण, लिवर किडनी, आंतो की गंभीर रोग लग चुके थे, और उनके जीवन में अलोपेथिक दवाइयों,  महंगी अर्थहीन जांचों, बार बार डॉक्टर बदलने के बाद भी कोई खास सुधार नहीं दिखाई दिया, तब उन्होंने आयुर्वेदिक जीवन शैली को अपने जीवन में उतारना शुरू किया, कम मसाले के ताजे भोजन, शाकाहार, और उचित आयुर्वेदिक दवाओं के सेवन के फलस्वरूप अमाशय के सभी रोगों से मुक्ति पा ली और अपने शरीर के भार, बढ़े हुए पेट, शारीरिक शिथिलता और बढ़ती हुई आयु के असर को भी काफी हद तक कम कर लिया और अब रोगरहित सुखी ऊर्जावान जीवन का आनंद उठा रहे हैं और अपने संबंधियों में भी आयुर्वेद का प्रचार कर रहे हैं। 



Thursday, July 8, 2021

आयुर्वेद क्या है

 


  •  आयुर्वेद क्या है ??




आयुर्वेद अत्यंत प्राचीन एवं नैसर्गिक स्वाथ्य & चिकित्सा पद्धति है, जिसका जन्म भारतवर्ष में ही हुआ और लाखों वर्षों क अनन्वेष्णो प्रयोगों और अनुभवों के आधार पर आयुर्वेद के सिद्धांत भारत के अनेकों ऋषि मुनियों द्वारा प्रतिपादित किये गए, आयुर्वेद शब्द संस्कृत भाषा में बना है, जिसे दो अन्य शब्दों को जोड़ कर बनाया गया है,  जिसमें पहला है  आयु और दूसरा है वेद अर्थात आयु से संबंधित वेद, और विस्तार से कहें तो वो वेद जिससे मनुष्य के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा और आयु को बढ़ाने के ज्ञान को प्राप्त किया जा सके I

आयुर्वेद का मूल उद्देश्य व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में समन्वय स्थापित करना है जिससे मनुष्य में आध्यात्मिकता का अंकुरण हो सके, आयुर्वेद किसी व्यक्ति में उत्पन्न हुए रोगों का कारण उस व्यक्ति के गलत खान पान और जीवन शैली को मानता है और उनके उपचार के लिए रोगी की बिगड़ी हुई जीवन शैली और अव्यवस्थित भोजन नियमों को सुधारने पर बल देता है और आवश्यकता पड़ने पर शोधन एवं शमन चिकित्सा के प्रयोग के लिए भी सलाह देता है I

आयुर्वेद का ज्ञान हजारों वर्षों से विभिन्न ऋषि मुनियों के द्वारा संरक्षित रखा गया था और गुरुओं के द्वारा अपने शिष्यों को मौखिक रूप से कंठस्त करा कर आयुर्वेद के बहुमूल्य ज्ञान को पर पीढ़ी को पहुचायाँ गया था, तदुपरांत कुछ ज्ञानी शिष्यों ऋषि मुनियों क द्वारा इस ज्ञान को ग्रंथो के रूप में संरक्षित किया गया और गुरुकुल शिक्षा के माध्यम से सारे विश्व भर में प्रसारित किया गया, आयुर्वेद के महान ऋषि चरक एवं ऋषि सुश्रुत ने जिन ग्रंथो के रूप में आयुर्वेद के ज्ञान का संरक्षण किया उन्हें चरक संहिता एवं सुश्रुत संहिता कहा जाता है, इसी प्रकार ऋषि पतंजलि ने भी आयुर्वेद को ग्रंथ के रूप में संरक्षित किया, जो आज देश भर में आयुर्वेद के विद्याथियों के अध्यन्न के लिए प्रमुख ग्रंथ माने जाते हैं. 

जहां तक एलोपेथी का प्रश्न है, उसमें किसी रोग के मूल कारणों का नहीं बल्कि उसके लक्षणों का इलाज किया जाता है, लेकिन आयुर्वेद में इसके विपरीत रोग के मूल कारणों पर ध्यान दिया जाता है और ये देखा जाता है की रोग किन मूल अवयवों की कमी और किस गलत भोजन शैली के कारण उत्प्पन्न हुआ है, आयुर्वेद का सारा जोर उसी के निदान पर रहता है  

हमें पूरा विश्वास है की हम इस ब्लॉग क माध्यम से पाठकों के आयुर्वेद संबंधित ज्ञान में वृद्धि होगी जिसके फलस्वरूप पाठकों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में उन्हें इसका लाभ मिल सकेगा I

वात कफ और पित्त - आयुर्वेद के दृष्टिकोण से

आयुर्वेद के त्रिदोष  आयुर्वेद में रोग की चिकित्सा रोगी के शरीर की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए की जाती है जबकी एलोपेथी में डॉक्टर सभी रोगिय...