अनंत काल से आयुर्वेद मनुष्य के लिए प्रकृति का वरदान साबित होता रहा है, भारत के अनेकों ऋषि मुनियों ने अपने ज्ञान और अनुभव के द्वारा आयुर्वेद की चिकित्सा के सिद्धांत प्रतिपादित किये, जो आज भी मनुष्य के लिए उतने ही प्रासंगिक हैं जितने पहले थे, मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए जो भी आवश्यक होता है वो किसी उचित जानकारी के आभाव में मनुष्य नहीं प्राप्त कर पाता है या कुछ गलत भोजन शैली और जीवन चर्या के कारण खुद को रोगो के संकट में डाल लेता है,
मानव शरीर में स्वास्थ्य के संतुलन को बनाये रखने के लिए जो तीन मुख्य तत्व जिम्मेदार होते हैं उन्हें आयुर्वेद में त्रिदोष कहा जाता है, और मनुष्य की निरंतर बदलती भोजन शैली, आचार विचार के कारण इन तीन दोषो के संतुलन में परिवर्तन आता रहता है, जिसके कारण ही शरीर में विभिन्न प्रकार के दोष और रोग उतपन्न होने लगते हैं इन इन तीनों दोषो को वात, कफ, और पित्त कहा जाता है,
आयुर्वेद शरीर को स्वस्थ रखने के लिए कुछ नियमों का पालन करना आवश्यक होता है , यही आयुर्वेद चिकित्सा पद्धिति का मूल है।
१. मनुष्य को हमेशा उचित नींद लेनी चाहिए, जरूरत से ज्यादा या कम सोना दोनों ही हानिकारक होते हैं, और जितना जल्दी हो सके रात को सही समय पर सो जाएँ और सुबह भोर काल में ही उठ जाएँ, भोर काल अर्थात सूरज निकलने से कुछ समय पहले, और सूर्य निकलने पर उषा पान करें
२. उठने के बाद हल्का गर्म गुनगुना एक लीटर पानी पीना चाहिए, उसे पीने से शरीर के अंदर की क्रियाएं धीरे धीरे शुरू होने लगती हैं. जिसके कारण मनुष्य को आसान नित्य कर्म में सहायता मिलती है, और पेट सही प्रकार से खाली हो पाता है फलस्वरूप सुबह सुबह ही मनुष्य कब्ज, रक्त चाप, अपच, वायु, और पेट के अन्य रोगों के चपेट में आने से बच जाता है ।
३. उसके उपरान्त मनुस्य को खुले स्थान पर योग क्रियाएं करनी चाहिए, जिससे शरीर अन्य रोगों से हमेशा के लिए बच सकता है और पूरे दिन के लिए स्फूर्तिमान बन जाता है और दैनिक कार्यों में अत्यंत ऊर्जावान होकर कार्य करता है
४. उचित प्रकार के जल से सुबह ही स्नान कर लेना चाहिए, जिससे शरीर अनावश्यक थकान और आलस्य से बच जाता है।
५. स्नान के बाद अपने पूजा घर में भगवान की पूजा उपासना जरूर करें , ध्यान लगाएं, मंत्र जाप करें. ध्यान लगाने से मन की एकाग्रता बढ़ती है, तनाव कम होता है,
६. पूजा कार्य के बाद उचित प्रकार से बना हुआ सात्विक नाश्ता करें और भरपूर मात्रा में करें जिससे आपके शरीर को दिन भर ऊर्जा मिलती रहे और दोपहर को मध्यम भोजन की ही आवश्यकता पड़े, साथ इस बात का भी ध्यान रखें की पानी भोजन करने से आधा घंटा पहले और आधा घंटा बाद ही पियें ।
आयुर्वेद के अनुसार भोजन कैसे करें
आम तौर पर हम लोग बिना जाने ही कुछ भी भोजन कर लेते हैं लेकिन आयुर्वेद में हर खाने योग्य पदार्थ के लिए मौसम और समय का निर्धारण किया गया है , साथ ही दिन भर में ३ लीटर सादा पानी पियें,
आयुर्वेद के अनुसार उचित भोजन के अवयव
आयुर्वेद मे भोजन मे रस का अत्यधिक महत्व बताय गया है, हमारे शरीर मे त्रिदोषो के सन्तुलन के लिये विभिन्न रसों का होना अत्यंत आवश्यक होता है जिनके होने से खाये जाने वाले भोजन को पचाना पेट के लिए आसान हो जाता है, ये रस ६ प्रकार के होते हैं १. मधुर (मिठास ), २. लवण (नमकीन), ३. तिक्त (तीखा) , ४. अम्ल (खट्टा), ५. कटु (कड़वा) ६. कषाय ( कसैला), ये ६ प्रकार के रस यदि हमारे भोजन में उचित अनुपात में होते हैं तो हमे भोजन के अत्यधिक लाभ मिलते हैं और भोजन भी रुचिकर लगता है, साथ ही इनकी कमी से होने वाले त्रिदोष में भी राहत मिलती है ।
पानी पीने के नियम
पानी को आयुर्वेद में अम्रत कहा गया है, तथा इसके पीने के भी नियम बताये गए हैं, पानी को खाने से आधा घंटा पहले पीना चाहिए, या खाने के आधा घंटा बाद और पानी को धीरे धीरे बैठ कर पीना चाहिए, जल्दी और एक साथ पानी पीना स्वास्थ्य के लिए नुक्सान दायक हो सकता है और कभी कभी साँस में भी रुकावट उत्पन्न कर सकता है ।
धूप का महत्व
मनुष्य को सुबह की धुप लेनी चाहिए, यदि एकदम सुबह की धुप न ले पाएं तो भी दिन में कभी भी १० १५ मिनट के लिए खुली हवा के साथ धुप लेनी चाहिए, सर्दियों में ये समय आधा घंटा या उससे ज्यादा होना चाहिए, धूप लेने से शरीर में विटामिन डी की मात्रा कम नहीं होती और हमारी हड्डियां मजबूत रहती हैं और नेत्रों की ज्योति भी बढ़ती है
नींद का महत्व
एक वयस्क मनुष्य को दिन भर में ८ से ९ घंटे की नींद लेनी चाहिए, जिससे शरीर की सारी थकान खत्म हो जाती है, और मनुष्य ऊर्जावान बना रहता है, साथ ही शरीर में नई कोशिकाओं का निर्माण होता है, और तनाव संबंधी रोगो से शरीर पूरी तरह मुक्त रहता है तथा शरीर पर बढ़ती आयु के लक्षण नहीं दिखाई देते, और शरीर युवा ही बना रहता है।
आयुर्वेद के अनुसार परहेज
आयुर्वेद में शरीर को बिमारियों से बचाने के लिए कुछ पदार्थों का त्याग भी उचित बताया गया है , जिससे हमारा स्वास्थ्य उत्तम बना रह सकता है, और रोगों से बचाव रहता है,
१. तामसिक पदार्थों जैसे मांस मछली, मदिरा अन्य नशे के पदार्थों का सम्पूर्ण त्याग उत्तम स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक बताया गया है.
२. किसी रोग के उपचार के समय जो भी आयुर्वेदिक औषधियां दी जाती हैं उनके नियमित सेवन के समय अत्यधिक चटपटे , तैलीय भोजन को त्यज्य बताया गया है जिनके कारण से रोगो के उपचार में देरी हो सकती है।
३. कभी भी भोजन में गर्म और ठंडे पदार्थ एक साथ नहीं खाने चाहिए जिससे पाचन पर बहुत बुरा असर पड़ सकता है और पाचन धीमा हो सकता है,
४. चाय काफ़ी का प्रयोग नहीं करना चाहिए , करना भी पड़े तो बहुत कम मात्रा में चाय कॉफी ले सकते हैं।
५. केले आम जैसे कुछ फलों को छोड़कर किसी रसीले फल के साथ दूध नहीं पीना चाहिए, संतरे प्रजाति के फलों के उपभोग के आस पास दूध पीना अत्यंत नुकसान दायक हो सकता है